मंगलवार, 9 दिसंबर 2025
रविवार, 23 नवंबर 2025
रविवार, 10 अगस्त 2025
सोमवार, 20 जनवरी 2025
हमेशा आप ही सही हों, जरूरी नहीं
बेटे ने मां से पूछा, ‘मां वो कौन है?
एक मां अपने बेटे के साथ बाजार जा रही थी। उसी समय उस बाजार से कुछ सिपाही एक चोर को लेकर जा रहे थे।
बेटे ने मां से पूछा, ‘मां वो कौन है? उसके आस-पास सिपाही क्यों हैं?’
मां ने कहा,‘वो एक चोर है। सिपाही उसे पकड़ कर ले जा रहे हैं, ताकि उसे जेल में बंद करें।’
थोड़ा आगे जाने पर नगर का राजा सामने आता नजर आया। उसके आस-पास भी बहुत सिपाही थे। बेटे ने तुरंत मां से कहा,‘मां, देखो सिपाही और एक चोर को ला रहे हैं।’
मां ने हलकी आवाज में कहा,‘धीमे बोलो बेटा, वह राजा है। ऐसी बात करने पर हमें दंड दे सकते हैं।’
बेटे ने कहा, ‘मां क्या फर्क है? राजा के आस-पास भी सिपाही हैं और चोर के आस-पास भी।’
मां ने कहा,‘जमीन-आसमान का फर्क है। उस चोर के आस-पास जो सिपाही हैं, वे चोर को काबू में रखते हैं, अगर वह भागने की कोशिश करे तो उसे और भी सख्त सजा मिल सकती है। सिपाही चोर को जो खाने को दें, उसे खाना होगा। जहां रहने को ले जाएं, वहां रहना होगा। इसके विपरीत, वे सारे सिपाही राजा के काबू में हैं। राजा जो बोले, वह उन्हें करना होगा। अगर राजा कहे मुझे अकेला छोड़ दो तो सिपाहियों को राजा का कहना मानना होगा।’
ऐसे ही हमारा मन, हमारी भावनाएं, हमारे विचार या हमारी इंद्रियां सिपाही हैं। अगर हम उनके काबू में हैं तो हम चोर हो गए और हमें अपने मन, विचार और इंद्रियों के वश में होकर जीवन जीना पड़ेगा। और अगर वे हमारे काबू में हों तो हम राजा की तरह जीवन जी पाएंगे।
आहत लोगों का एक-दूसरे के प्रति आकर्षण
ऐसे लोग जिन्हें आप नहीं जानते या फिर वे वास्तव में मौजूद नहीं होते, उनके साथ एकतरफा भावनात्मक रिश्ता होना पैरासोशल संबंध कहलाता है। किसी गायक, खिलाड़ी, अभिनेता, किसी किताब या शो के काल्पनिक पात्र से जुड़कर उनके फैन होना यही है। कई बार समर्पण इतना होता है कि व्यक्ति उनकी हर छोटी बात पर नजर रखता है, उनसे प्रभावित रहता है, उनकी जीत-हार को खुद के साथ जोड़ लेता है।
हार्वर्ड कैनेडी स्कूल में प्रोफेसर, समाजशास्त्री और लेखक अर्थर सी. ब्रूक्स के अनुसार, ‘ये रिश्ते दूसरों से जुड़ने की हमारी सहज प्रवृत्ति से ही बनते हैं। आज अपने पसंदीदा सेलिब्रिटीज और काल्पनिक किरदारों से जुड़ी सूचनाओं तक पहुंच बनाने के कई साधन मौजूद हैं। हैरी पॉटर बुक सीरीज और बे्रकिंग बैड जैसे टीवी शो की लोकप्रियता का बड़ा कारण यह भी है। आप इन चरित्रों से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं, फिर भले वह पात्र मनोरोगी भी हो। पर, बु्रक्स कहते हैं कि हर रिश्ते की तरह इन संबंधों के फायदे और नुकसान दोनों हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, माता-पिता को बच्चों के पैरासोशल संबंधों पर नजर रखनी चाहिए। अगर आप खुशी के लिए किसी एक किरदार पर बहुत अधिक निर्भर हैं तो देखें कि असल कमी कहां है? बेहतर यह है कि आप असल जीवन में मधुर संबंध बनाएं। किसी मित्र के साथ भोजन करें। परिवार संग समय बिताएं। लोगों को स्पर्श करें, गले लगाएं। जब असली रिश्ते अच्छे बनेंगे तो काल्पनिक किरदारों की कम परवाह करेंगे।
(हार्वर्ड हेल्थ ब्लॉग से साभार)
लाभ
ये रिश्ते जीवन के लिए अच्छे पूरक हो सकते हैं। आपको प्रेरित, शिक्षित और सुकून दे सकते हैं। एक समूह या विचार से जुड़े होने के कारण व्यक्ति अकेलापन कम महसूस करता है। किसी किरदार से बहुत जुड़ाव मूल्यों पर भी असर डाल सकता है। हम उनसे सही-गलत के सबक, अनुशासन व आदि सीखने के लिए प्रेरित होते हैं।
नुकसान
बू्रक्स कहते हैं, ‘ऐसे रिश्तों में प्यार के बदले में प्यार नहीं मिलता। ये नकली भोजन की तरह है, जो देखने में सुंदर हैं पर पोषण नहीं मिलता। ऐसे में अगर आप बहुत निर्भर हैं, तो अकेलापन और अलगाव बढ़ सकता है। हम पात्र से गलत सबक सीख सकते हैं।
आहत लोगों का एक-दूसरे के प्रति आकर्षण
अपने अकेलेपन को दें सही दिशा
यं को बेहतर बनाते हुए आगे बढ़ना एक अलग सा अनुभव होता है। कभी-कभी यह एक खूबसूरत अहसास लगता है तो कभी बहुत अजीब सा महसूस होने लगता है। असल में जब आप सालों तक भावनात्मक आघात झेलने और बचपन के कड़वे अनुभवों को संज्ञान में लेकर उनसे बाहर निकलने की दिशा में काम करने लगते हैं तो आपका एक नया व्यक्तित्व उभर कर सामने आने लगता है। अचानक ही आप स्वयं को एक ऐसी दुनिया में पाते हैं, जहां आप अकेले हैं। किसी स्थिति में फंसे रहने और उससे बाहर निकलने के बीच का यह फासला एक ऐसी खाई की तरह महसूस होता है, जिसे पाटा नहीं जा सकता है।
बस पड़ाव है अकेलापन
स्वयं के विकास और आगे बढ़ने की यात्रा हममें बहुत कुछ बदलाव लाती है। हम दुनिया को और खुद को अलग ढंग से देखने लगते हैं। हीलिंग की प्रक्रिया में कई बार हमें अपने एकाकीपन को भी गले लगाना पड़ता है। आपकी प्राथमिकताएं और रिश्तों को लेकर समझ तो बदलती ही है साथ ही ऊपरी दिखावे वाले रिश्ते भी खोखले लगने लगते हैं।
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन द्वारा 2023 में किए गए एक शोध के अनुसार, 48 प्रतिशत अमेरिकी अकेलेपन का शिकार हैं और 60 प्रतिशत लोगों को लगता है कि कोई उन्हें समझता ही नहीं है। अकेलापन असहज करता है, क्योंकि हम अपनी कमजोरियों का सामना करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए, बहुत से लोग ऐसे परिवेश में पले-बढ़े होते हैं, जहां भावुक होने को कमजोरी की निशानी माना जाता है। इसलिए उन्हें अपनी पीड़ा व्यक्त करने की बजाय उसे छिपाने की शिक्षा दी जाती है। लेकिन, जब आप ऐसे माहौल से खुद को बाहर निकालने के प्रयास करने लगते हैं तो आप आपसी समझ, सम्मान, ईमानदारी और पारदर्शी रिश्तों के प्रति आकर्षित होने लगते हैं। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या कम ही होती है।
पुरानी रूढ़ियों से आगे निकलना
स्वयं का विकास उन संबंधों से आगे निकलना भी है, जो कभी आपको सुकून पहुंचाते थे। कहते हैं कि हम अपनी सोच जैसे लोगों के प्रति ही आकर्षित होते हैं। अर्थात, जब दो लोग मिलते हैं तो उनके छिपे हुए दर्द भी अकसर आपस में जुड़ जाते हैं। विख्यात मनोविशेषज्ञ हार्वेल हेंड्रिक्स ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि हम ऐसे साथी का चुनाव करते हैं, जो हमारे अतीत के घावों को परिलक्षित करता है। लेकिन जब आप बेहतर महसूस करने लगते हैं तो स्वत: ही ऐसे लोगों से दूरी बना लेते हैं। यदि आप अपने अतीत के कटु अनुभवों या यादों के साथ सेहतमंद तरीके से निबटना सीख जाते हैं तो वो लोग अपने आप ही दूर होने लगते हैं, जो ऐसा करना नहीं जानते हैं। आपकी भावनात्मक स्पष्टता उन्हें अपनी पहुंच से बाहर लगने लगती है, जबकि वे उसी पुराने चक्र में उलझे रहते हैं।
ऐसे बनेंगे सेहतमंद रिश्ते
ऐसे समाज में जहां हर व्यक्ति संघर्ष कर रहा हो, अच्छे और बेहतर रिश्ते बनाना अपने आप में बहुत थका देने वाला अनुभव हो सकता है। लेकिन, यह असंभव कार्य नहीं है। कुछ बातों का ध्यान रखकर ऐसा किया जा सकता है।
समान सोच के लोगों से जुड़ें
ऐसे समुदायों का हिस्सा बनें, जहां विकास, चेतना और सकारात्मक तरीकों से आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता हो। आप चाहें तो किसी ऑनलाइन सपोर्ट ग्रुप या ध्यान शिविर में भी हिस्सा ले सकते हैं। इन स्थानों पर आपको अपनी मानसिक सेहत बेहतर बनाने में बहुत मदद मिल सकती है।
सीमाओं का निर्धारण
जो लोग आपकी भावनात्मक ऊर्जा बेकार में खर्च करवाते हों, उनसे दूरी बना लेने में कोई बुराई नहीं है। सीमाओं का अर्थ दीवार नहीं है, बल्कि अपनी मानसिक शांति की रक्षा करना भी है। सीमाएं निर्धारित कर लेने पर आपको भावनात्मक रूप से परिपक्व लोगों के साथ समय बिताने का अधिक समय मिलेगा। आप खुद को बेहतर और ऊर्जावान महसूस करेंगे।
सच्चे रिश्तों को महत्व दें
जो लोग आपसे प्रेम करते हैं और आपको आगे बढ़ते देखकर खुश होते हैं, उन्हें सहेज कर रखें। हो सकता है ऐसा करने से आपके पास बहुत कम रिश्ते बचें। पर, ये वो कीमती रिश्तें हैं, जो आपको नई राह दिखाएंगे।
जारी रखें अपनी यात्रा
हो सकता है कि और ज्यादा बेहतर की चाह आपको अपने भीतर बदलाव करने के लिए उकसाती हो। पर, उस कारण को याद रखिए, जिसकी वजह से आप यहां तक बढ़ कर आए हैं। अपनी यात्रा में साथ देने वाले लोगों पर भी भरोसा रखिए कि वे आपको सही मार्ग चुनने में मदद करेंगे। खुद पर यकीन और अपनों का साथ यात्रा के आनंद को बढ़ा देता है।
आहत लोगों का एक-दूसरे के प्रति आकर्षण
यह मानव स्वभाव है और शोध भी मानते हैं कि भावनात्मक रूप से आहत लोग एक-दूसरे के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं। पर्सनैलिटी एंड सोशल साइकोलॉजी द्वारा किए गए एक शोध में भी पाया गया कि एक जैसी भावनात्मक समस्याओं से जूझ रहे लोग आपस में ज्यादा जुड़ते हैं। लेकिन, जब आप इस चक्र को तोड़ने की दिशा में काम करते हैं तो आपके रिश्तों का रूप बदल जाता है। जो शुरुआत में कुछ खोने या अकेले पड़ जाने का अहसास देता है। कई बार ऐसे लोग आप पर उनसे जुड़े रहने के लिए दबाव डालते हैं, आपको खुदगर्ज मान लेते हैं। ऐसे क्षणों में खुद पर भरोसा रखना आपकी अपनी मानसिक सेहत को अच्छा रखने में मदद कर सकता है।
आगे बढ़ने से मिलेगी शांति
आगे बढ़ने के साथ-साथ आपको समझ आने लगता है कि आप अकेले नहीं हैं। दुनिया में अनेक ऐसे लोग हैं, जो आगे बढ़ते हुए आपकी तरह ही अकेला महसूस करते हैं। लेकिन स्वयं की बेहतरी लोगों की भीड़ में नहीं, बल्कि अंतर्मन को जाग्रत करने में ही निहित है। इसलिए हतोत्साहित करने वाले लोगों की तरफ ध्यान न देकर सिर्फ मंजिल की ओर कदम बढ़ाएं। अपने से जुड़ते हुए आगे बढ़ना ही असल शांति की ओर ले जाता है।
शनिवार, 18 जनवरी 2025
शनिवार, 17 अगस्त 2019
जिएं तो जिएं कैसे
प्रत्येक बड़ा कारोबार कभी न कभी छोटा ही होता है. इस ग्लोबल सुभाषित की भारतीय व्याख्या कुछ इस तरह होगी कि भारत में हर छोटा कारोबार छोटे रहने को अभिशप्तहोता है. आमतौर पर या तो वह घिसट रहा होता है, या फिर मरने के करीब होता है. यहां बड़ा कारोबारी होना अपवाद है और छोटे-मझोले बने रहना नियम. कारोबार बंद होने की संभावनाएं जीवित रहने की संभावनाओं की दोगुनी होती हैं.डर के आगे जीत है
ऐसा अक्सर नहीं होता जब प्रत्येक उदारीकरण और विदेशी मेलजोल पर बिदकने वाले स्वदेशी और अर्थव्यवस्था को खोलने के परम पैरोकार उदारवादी एक ही घाट पर डुबकी लगाते नजर आएं.डुबाने की लत

रविवार, 4 जून 2017
नीतीश जी, यह पत्र जरूर पढ़ियेगा। प्लीज!!!
आप बिहार के मुख्यमंत्री हैं, तो हमारे भी मुख्यमंत्री हैं, इस नाते आपका सम्मान करता हूं, लेकिन मुझे पता है कि बंद चिट्ठियां आपके पते पर पहुंचकर लापता हो जाती हैं, इसलिए खुला पत्र लिख रहा हूं, ताकि सनद रहे।
इससे पहले एक और खुला पत्र मैंने आपको इनसेफ़लाइटिस से मरते बच्चों को बचाने की खातिर 2012 में लिखा था। तब मुद्दा हमारे बच्चों के जीवन का था। अब मुद्दा हमारे बच्चों के भविष्य का है, जिसे पिछले 12 साल में आपने क्रमशः बर्बाद कर दिया है। आज जिन बच्चों का 12वीं का रिजल्ट आया है, वे उसी साल पहली कक्षा में दाखिल हुए थे, जिस साल आप पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। यानी 2005 में। सोचिए, एक तरफ़ आप बिहार के मुख्यमंत्री बने, दूसरी तरफ़ इन बच्चों के मां-बापों की आंखों में इनके भविष्य को लेकर सपने पैदा हुए। जैसे-जैसे आपके मुख्यमंत्रित्व का एक-एक साल बीतता गया, ये बच्चे एक-एक क्लास बढ़ते रहे। आज आपको मुख्यमंत्री बने 12 साल हुए हैं और इन बच्चों ने 12वीं का इम्तिहान दिया है।
इसीलिए, जब लोग कह रहे हैं कि 12वीं के इम्तिहान में बिहार के दो तिहाई बच्चे फेल हो गए हैं, तो मुझे लगता है कि बच्चे नहीं, बल्कि स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फेल हुए हैं। और फेल होते कैसे नहीं, बिहार की शिक्षा का सत्यानाश करने में तो आप पहले दिन से ही जुट गए थे। देखिए, इन बारह सालों में राज्य की शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करने में आपका योगदान कितना अहम (या अधम?) रहा है-
1. आपने राज्य भर के स्कूलों में फ़र्ज़ी मार्क्स-शीट और सर्टिफिकेट वाले हज़ारों या लाखों अनपढ़ लोगों को शिक्षकों के रूप में नियोजित कर लिया। न कोई जांच, न कोई पड़ताल, न कोई इम्तिहान, न कोई इंटरव्यू! सिर्फ़ वोट-बैंक की राजनीति और पैसे का खुल्लमखुल्ला खेल। जनवरी फरवरी की स्पेलिंग तक नहीं जानने वाले लोग भी सरकारी स्कूलों में गुरूजी बन गए।
2. आपने राज्य के तमाम स्कूलों को विद्यालय नहीं, भोजनालय बना दिया। और भोजनालय भी ऐसा, जिसमें भोजन के नाम पर मरी हुई छिपकिलियां, तिलचट्टे और कीड़े-मकोड़े सर्व किए जाते रहे। राज्य के किसी भी ज़िले में शायद ही कोई स्कूल ऐसा रहा होगा, जहां आपका मिड-डे मील खाकर बच्चे कभी-न-कभी अस्पतालों में भर्ती नहीं हुए होंगे।
3. छपरा के धर्मासती गंडामन गांव के स्कूल में तो दिल दहला देने वाला वह “कारनामा” हुआ, जो आज़ाद हिन्दुस्तान के किसी भी स्कूल में नहीं हुआ था। आपका मिड-डे मील खाकर हमारे 23 लाल बहादुर शास्त्री असमय काल के गाल में समा गए। इसे “हादसा” नहीं, “कारनामा” कह रहा हूं, क्योंकि राज्य के स्कूलों में मिड-डे मील खाकर बार-बार बच्चों के बीमार होने की घटनाएं घट रही थीं और हम जैसे लोग बार-बार आपको आगाह कर रहे थे कि किसी भी दिन बड़ी घटना हो सकती है। लेकिन आपकी सरकार में ग़रीबों के बच्चों के एक वक्त के मिड-डे मील के ढाई-तीन रुपये में भी घोटाले चल रहे थे।
4. आपने शिक्षकों को शिक्षक नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें आटे-चावल-दाल का हिसाब रखने वाला रसोइया बना दिया। आपके स्कूलों में गुरुजी खैनी खाकर बच्चों का भविष्य थूकते रहे और आप देश को साइकिल चलाती हुई लड़कियां दिखाकर सुशासन बाबू कहलाते रहे।
5. जिन साइकिलों के सहारे आप सुशासन बाबू बने, उन साइकिलों में भी कम घोटाले नहीं हुए। जो छात्र आपके स्कूलों में नहीं पढ़ते थे, उनके नाम पर भी साइकिलें बांटी गईं। स्कूलों की साइकिलें दुकानों और अन्य लोगों को बेची गईं। बिना साइकिलें खरीदे साइकिल दुकानों से फ़र्ज़ी पर्चियां बनवाकर भी सरकार से पैसे लिए गए।
6. पोशाक के पैसों के लिए आपने राज्य भर के बच्चों को भिखमंगा बना दिया। ये पैसे किसी को दिए, किसी को नहीं दिए, जिससे इनके वितरण में भेदभाव को लेकर बड़ी संख्या में बच्चे सड़कों पर उतरकर आगज़नी, तोड़-फोड़ और पत्थरबाज़ी करते हुए देखे गए। आपकी पुलिस लाठियां बरसाकर उन मासूम बच्चों को घर भेजती रही, लेकिन आपने कभी यह नहीं सोचा कि आपकी सरकार बच्चों को कैसी शिक्षा और कैसा संस्कार देने में जुटी है।
7. वोट बैंक और कमाई के चक्कर में एक तो स्कूलों में घटिया शिक्षक नियोजित किये गए, दूसरे उनमें अगर कुछ ठीक-ठाक भी थे, तो लंबे समय तक उन्हें मनरेगा मज़दूरों से भी कम मानदेय दिया गया, जिससे बच्चों को पढ़ाने-लिखाने को छोड़कर बाकी सारे काम वे करते थे। ज़्यादातर समय आपके शिक्षक मानदेय बढ़ाने के लिए आंदोलन करते रहे और आपकी पुलिस लाठियां बरसाकर उनकी कमर, पीठ, छाती, माथा तोड़ती रही।
8. एक तरफ़ स्कूलों में योग्य शिक्षकों और ज़रूरी सुविधाओं का अभाव, दूसरी तरफ़ पढ़ाई नदारद। आपकी सरकार में बैठे लोगों ने इस शर्मनाक स्थिति को भी कमाई का ज़रिया बना लिया। राज्य भर में पेपर आउट, नकल और पैरवी का बोलबाला है। अब तो हालात इतने बुरे हो चुके हैं कि बच्चों और उनके अभिभावकों को फोन करके नंबर बढ़ाने के लिए घूस मांगी जा रही है।
9. पॉलिटिकल साइंस को खाना बनाने का विज्ञान समझने वाले बच्चे टॉप कर रहे हैं और आईआईटी कम्पीट करने वाले बच्चे फेल कर रहे हैं। अधिकांश बच्चे जनरल मार्किंग और अयोग्य लोगों द्वारा कॉपी जांच के शिकार हो रहे हैं। गलत तरीके से फेल कराए गए बच्चे सड़कों पर उतर आए हैं और आपकी पुलिस उन्हें लाठियों से पीट रही है। कई बच्चों ने तो सुसाइड भी कर लिया है। इन बच्चों के लिए आपका रोआं कभी सिहरता है?
10. एक तरफ़ आपने सरकारी शिक्षा-व्यवस्था को ध्वस्त किया, दूसरी तरफ़ प्राइवेट शिक्षा माफिया को लगातार फ़ायदा पहुंचाया। समान स्कूल प्रणाली को लेकर मुचकुंद दुबे कमेटी की महत्वपूर्ण सिफ़ारिशों को आपने कूड़ेदान में डाल दिया। स्पष्ट है कि सरकारी स्कूलों की चिता पर आप प्राइवेट स्कूल कारोबारियों के महल बुलंद करना चाहते हैं। आपकी नाक के नीचे आपके चहेते कई बाहुबलियों ने किसानों की ज़मीनें कब्जाकर बड़े-बड़े प्राइवेट स्कूल खोल लिए और सरकारी स्कूल तिल-तिल कर अपनी मौत की तरफ़ बढ़ रहे हैं।
11. शिक्षा प्राप्त करने के बाद बच्चे नौकरी के लिए निकलते हैं, लेकिन बिहार में एक भी नौकरी ऐसी नहीं बची है, जिसे मेरिट के आधार पर हासिल किया जा सके। आपकी सरकार में एक-एक सीट बिकी हुई है। आज अगर डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद भी आ जाएं, तो बिना घूस दिए उन्हें बिहार में सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती।
आदरणीय नीतीश कुमार जी, एक समय आप कहते थे कि लालू यादव के जंगलराज की वजह से बिहार पूरे देश में बदनाम हो गया है। यह अलग बात है कि आजकल आप उन्हीं लालू जी की गोदी में बैठकर सेक्युलरिज़्म का सारेगामा गा रहे हैं। लेकिन माफ़ कीजिए, आज एक बार फिर से हम बिहारियों को शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है और इस बार वजह लालू यादव नहीं, बल्कि आप हैं। लालू यादव की सरकार में कानून-व्यवस्था और सड़कों की हालत जितनी ख़राब नहीं थी, उससे अधिक ख़राब आपके राज में शिक्षा की हालत हो चुकी है।
कानून-व्यवस्था एक महीने में और सड़कें एक साल में दुरुस्त की जा सकती हैं, लेकिन शिक्षा-व्यवस्था ध्वस्त हो जाए, तो पीढ़ियां बर्बाद हो जाती हैं। इसलिए, अगर मैं राजनीति में होता, तो आपके इस्तीफ़े की मांग करता। लेकिन आपके राज्य का एक मामूली नागरिक हूं, इसलिए केवल इस स्थिति में सुधार की मांग कर रहा हूं।
आदरणीय नीतीश कुमार जी, क्या इतने का भरोसा भी आप दे सकते हैं? शुक्रिया।
रविवार, 5 मार्च 2017
नालंदा में भीड़ देख लो नीतीश बाबू, आपकी नींद उड़ जाएगी : मोदी
26oct2015
-पीएम ने भीड़ देख नीतीश पर साधा निशाना, कहा मुझे लगता है यहां एक साथ चार-चार रैलियां -कहा दंभ, दगा एवं दमन, यही इन तीनों नेताओं की पहचान की पहचान
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अशोक सिंह, बिहारशरीफ
नालंदा ज्ञान की भूमि के नमन कर रहलीएह.. ई भगवान महावीर, बाबा मखदुम साहब के भूमि के हम प्रणाम करतीयई हई। हम ज्ञान के धरती पर आके गौरव महसूस कर रहलीय ह..। हम रउहनी के प्रणाम करत हईं। रविवार को बिहारशरीफ के गोलापर हवाई अड्डा मैदान में एनडीए के विशाल जनसमूह का संबोधन प्रधानमंत्री ने इन्हीं शब्दों के साथ शुरू किया। ठीक 2.30 बजे पहुंचे पीएम नरेंद्र मोदी ने नेताओं एवं उपस्थित जनसमूह को अभिवादन करने के बाद बड़े-छोटे भाईयों पर निशाना साधना शुरू कर दिया।
बिहारशरीफ के गोलापुर हवाई अड्डा मैदान में भीड़ देखकर सवालिया लहजे में पीएम ने कहा कि चुनाव का नतीजा तो आठ नवंबर को आएगा, लालू एवं लोक-तांत्रिक नीतीश बाबू देख लो। अब आपका क्या होगा। पता नहीं क्या से क्या हो गया। ये बिहार के नागरिकों की सूझबूझ है। यहां के लोगों का राजनीतिक बड़प्पन है। यहां के लोगों की सोच राजहंस जैसी सोच है। वे आसानी से दूध का दूध और पानी का पानी कर सकते हैं। ये माहौल चुनाव की विजय का माहौल नहीं है, केवल नीतीश, लालू, सोनिया को पराजित करने का महौल नहीं है, ये तीनों लोगों को सजा देने का माहौल है। उन्होंने कहा दंभ, दगा एवं दमन, यही इन तीनों नेताओं की पहचान है।
नरेंद्र मोदी ने कहा कि हिंदुस्तान के पांचवीं कक्षा का छात्र भी नालंदा की जानकारी रखता है। उसे पता होता है कि नालंदा का कैसा गौरवशाली इतिहास रहा है। कल्पना कर सकते हैं कि कितनी महान विरासत के आप धनी हैं। जिस बिहार के पास नालंदा जैसी विरासत है, पूरा हिंदुस्तान सदियों से सीना तानकर जी रहा हो, आजादी के बाद उस नालंदा की चिंता होनी चाहिए थी। लेकिन सत्ता में रहे लोगों को नालंदा की याद नहीं आई। लगातार 45 मिनट तक सवाल दागते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि पूरा विश्व ज्ञान की पिपासा बुझाने नालंदा में आता है, लेकिन क्या हो गया कि जो नालंदा की धरती दुनिया को ज्ञान देती थी, वहां के नौजवान को शिक्षा के लिए अपना घर छोड़ना पड़ता है। ये तांत्रिक नीतीश बाबू के कारण हुआ, उन्हें लगता है बिहार को तांत्रिक ही बचा सकते हैं। उन्होंने कहा नीतीश जी बिहार को युवाओं को तांत्रिकों की जरूरत नहीं है। बिहार में महास्वर्थबंधन बनाया। इसमें लालू, लोक-तांत्रिक नीतीश कुमार और तीसरी मैडम सोनिया के अलावा चौथा भी है जो तांत्रिक है। क्या 18वीं सदी की सोच से बिहार आगे बढ़ेगा। बिहार के युवाओं को तंत्र-मंत्र नहीं, कंप्यूटर-लैपटॉप चाहिए। ये सपने देख रहे थे कि देश के टुकड़े-टुकड़े करने की राजनीति के दम पर देश का प्रधानमंत्री बन जाएंगे। पिछड़े परिवार में पैदा हुआ बेटा कैसे प्रधानमंत्री कैसे बन गया, ये गुस्सा इस बात का है। जहर इस बात का है कि गरीब परिवार का बेटा अचानक प्रधानमंत्री कैसे बन गया।
आज पूरे विश्व में हिंदुस्तान का डंका बज रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है... मोदी के कारण नहीं हो रहा, दुनिया में जो जय-जयकार सवा सौ करोड़ देशवासी के वजह से हो रहा है। उन्होंने जनसमूह से पूछा पूरे हिंदुस्तान में बिहार का डंका बजना चाहिए या नहीं। अगर ऐसा चाहते हैं तो बिहार में दो तिहाई वाली एनडीए की सरकार बना दीजिए। 14 साल तक गुजरात में राज किया, मध्यप्रदेश में 15 साल से हैं, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, हरियाणा, गोवा में हमारी सरकार है। लेकिन कभी आरक्षण पर आंच तक नहीं आने दिया। हमने पिछड़ापन देखा है, गरीबी में कैसे गुजारा करना पड़ता है। हम आरक्षण को हटाने का कभी सोच भी नहीं सकते। इस चुनाव में हम विकास की बातचीत लेकर आए हैं, दूसरी ओर जंगलराज की राजनीति है। उन्होंने कहा कि हमने सवा लाख करोड़ रुपये दिए। लालू जी के युवराज को सवा लाख करोड़ लिखने को कहा जाए, तो लिख नहीं पाएंगे। जिनको सवा लाख करोड़ लिखना नहीं आता, क्या वे बिहार का विकास कर पाएंगे। पीएम ने कहा कि मुझे बाहरी कहा जाता है। लालू-नीतीश से पूछना चाहता हूं कि बिहार के नौजवान को बाहर जाने का दोषी कौन है।
सोमवार, 28 नवंबर 2016
:👌:: *एक खूबसूरत सोच* ::👌:
अगर कोई पूछे कि जिंदगी में क्या खोया और क्या पाया ? .... .... तो बेशक कहना, जो कुछ खोया वो मेरी नादानी थी और जो भी पाया वो प्रभू की मेहेरबानी थी। क्या खुबसूरत रिश्ता है मेरे और मेरे भगवान के बीच में, ज्यादा मैं मांगता नहीं और कम वो देता नहीं...✍”॥
▁▂▄▅▆▇██▇▆▅▄▂▁
☄जीवन के तीन मंत्र☄
☄ *आनंद में - वचन मत दीजिये*
☄ *क्रोध में - उत्तर मत दीजिये*
☄ *दुःख में - निर्णय मत लीजिये*
💐💎 जीवन मंत्र 💎💐
१) धीरे बोलिये 👉 शांति मिलेगी
२) अहम छोड़िये 👉 बड़े बनेंगे
३) भक्ति कीजिए 👉 मुक्ति मिलेगी
४) विचार कीजिए 👉 ज्ञान मिलेगा
५) सेवा कीजिए 👉 शक्ति मिलेगी
६) सहन कीजिए 👉 देवत्व मिलेगा
७) संतोषी बनिए 👉 सुख मिलेगा
"इतना छोटा कद रखिए कि सभी आपके साथ बैठ सकें। और इतना बड़ा मन रखिए कि जब आप खड़े हो जाऐं, तो कोई बैठा न रह सके।"
👌 शानदार बात👌
झाड़ू जब तक एक सूत्र में बँधी होती है, तब तक वह "कचरा" साफ करती है।
लेकिन वही झाड़ू जब बिखर जाती है, तो खुद कचरा हो जाती है।
इस लिये, हमेशा संगठन से बंधे रहें , बिखर कर कचरा न बनें।
💐🌴🍁🌾🌷🌻🎄🌱🎋
🙏
बारिश के दौरान सारे पक्षी आश्रय की तलाश करते हैं लेकिन बाज़ बादलों के ऊपर उडकर बारिश को ही अवॉयड कर देते है। समस्याए कॉमन हैं, लेकिन आपका एटीट्यूड इसमें डिफरेंस पैदा करता है।
समस्याए कॉमन हैं, लेकिन आपका एटीट्यूड इसमें डिफरेंस पैदा करता है।
- अब्दुल कलाम
आपको अपने भीतर से ही विकास करना होता है। कोई आपको सिखा नहीं सकता, कोई आपको आध्यात्मिक नहीं बना सकता आपको सिखाने वाला और कोई नहीं, सिर्फ आपकी आत्मा ही है।
- स्वामी विवेकानंद
आत्मविश्वास और कड़ी मेहनत, असफलता नामक बीमारी को मारने के लिए सबसे बढ़िया दवाई है। ये आपको एक सफल व्यक्ति बनाती है।
-अब्दुल कलाम
विपरीत परस्थितियों में कुछ लोग टूट जाते हैं, तो कुछ लोग लोग रिकॉर्ड तोड़ देते हैं।
-शिव खेड़ा
देश का सबसे अच्छा दिमाग, क्लास रूम की आखरी बेंच पर भी मिल सकता है।
-अब्दुल कलाम
आप अपना भविष्य नहीं बदल सकते पर आप अपनी आदते बदल सकते हैं और निश्चित रूप से आपकी आदतें आपका भविष्य बदल देगी।
- अब्दुल कलाम
अगर आप सोचते हैं कि आप कर सकते हैं, तो आप कर सकते हैं। अगर आप सोचते हैं कि आप नहीं कर सकते हैं, तो आप नहीं कर सकते हैं।
-शिव खेड़ा
मैं अकेली हूँ, लेकिन फिर भी मैं हूँ। मैं सबकुछ नहीं कर सकती, लेकिन मैं कुछ तो कर सकती हूँ और सिर्फ इसलिए कि मैं सब कुछ नहीं कर सकती, मैं वो करने से पीछे नहीं हटूंगी जो मैं कर सकती हूँ।
-हेलेन किलर
कभी भी दुष्ट लोगों की सक्रियता समाज को बर्वाद नहीं करती, बल्कि हमेशा अच्छे लोगों की निष्क्रियता समाज को बर्बाद करती है।
-शिव खेड़ा
किसी दिन, जब आपके सामने कोई समस्या ना आये तो आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं ।
-स्वामी विवेकानंद
किसी डिग्री का ना होना दरअसल फायेदेमंद है, अगर आप इंजिनियर या डाक्टर हैं तब आप एक ही काम कर सकते हैं पर यदि आपके पास कोई डिग्री नहीं है, तो आप कुछ भी कर सकते हैं।
-शिव खेड़ा
किसी वृक्ष को काटने के लिए आप मुझे छ: घंटे दीजिये और मैं पहले चार घंटे कुल्हाड़ी की धार तेज करने में लगाऊंगा।
-अब्राहम लिंकन
हम वो सब कर सकते हैं जो हम सोच सकते हैं और हम वो सब सोच सकते हैं जो आज तक हमने नहीं सोच
एक सौ पचास दिन न सही 50 दिन ही बिताया जाये स्वयं को पुनर्स्थापित करने में
पंख भारी होकर उड़ान को सीमित कर देते हैं | भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना, और भोजन खाना तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं |
2. गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे |
3. या फिर "स्वयं को पुनर्स्थापित करे"
और प्रतीक्षा करता है पंखों के पुनः उग आने का एक सौ पचास दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी इस पुनर्स्थापना के बाद वह तीस वर्ष और जीता है ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ |
और मोदी सरकार कुछ ऐसा ही कर रही है इसलिए अगर कुछ पीड़ा हो तो उसको अमृत मान ले और सह ले 50 दिन की पीड़ा को जो नोटबंदी के कारण हो रही है
शनिवार, 27 जुलाई 2013
शादी से पहले कुँआरेपन का टेस्ट?
राष्ट्रीय आँकड़ों के मुताबिक यह रक़म उस खर्च से बड़ी है, जो औसतन एक आदमी महीने भर में खर्च करता है.
'कौमार्य परीक्षण' की सेवा लेने वाली ज्यादातर महिलाओं के साथ उनके रिश्तेदार, उनके होने वाले पति और कभी-कभार तो सास भी होती हैं.
शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012
जनसंघ की नींव पर भाजपा, अनजान खेवनहार
अशोक सिंह, जमशेदपुर : 'पार्टी विथ डिफरेंसÓ का दंभ भरने वाली भाजपा के बहुसंख्य वरिष्ठ कैडरों को ही अपने संगठन के संबंध में बुनियादी जानकारी तक नहीं है। शुक्रवार को यह सच्चाई तब बेपर्द हुई जब पार्टी का स्थापना दिवस मना रहे कार्यकर्ताओं से उनके ही दल से संबंधित चंद सामान्य से सवाल किये गये। जैसे पार्टी के संस्थापक कौन थे, कब पार्टी की स्थापना हुई, पार्टी के मुखपत्र का नाम क्या है आदि-आदि। अधिकांश भाजपाई इन प्रश्नों का जवाब देने में बगलें झांकने लगे। किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए कार्यकर्ता उसकी रीढ़ होते हैं। वे ही जनता में जा कर पार्टी की नीतियों या अपनी सरकार की उपलब्धियों को उनतक पहुंचाते हैं। पेश है भाजपा नेताओं से बातचीत पर दैनिक जागरण की रिपोर्ट :
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राखी राय
राखी-पांच सालों से भाजपा की सेवा दिर-रात कर रही हूं।
सवाल : भाजपा कौन सी स्थापना दिवस मना रही है?
राखी : (इधर-उधर देखते हुए)पता नहीं।
सवाल : भाजपा की स्थापना किसने की थी?
जबाब : मालूम नहीं।
राखी : पार्टी के मुखपत्र का नाम क्या है?
जबाब : पता नहीं।
सवाल : पार्टी के दो राष्ट्रीय महासचिवों के नाम?
राखी : वो कौन हैं..... अनंत....
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नरेश पासवान(अनुसूचित जनजाति मोर्चा अध्यक्ष)
नरेश-पार्टी में अभी ही आया हूं।
सवाल : भाजपा कौन सी स्थापना दिवस मना रही है?
नरेश : रुकिए पूछ कर आता हूं।
सवाल : भाजपा की स्थापना कब और कहां हुई?
नरेश : अभी जानकारी नहीं है।
सवाल : पार्टी के मुखपत्र का नाम क्या है?
नरेश : पता नहीं।
सवाल : पार्टी के दो राष्ट्रीय महासचिवों के नाम?
जबाब : पता नहीं।
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अशोक सिंह(जिला उपाध्यक्ष)
अशोक-काफी दिनों से पार्टी की सेवा कर रहा हूं।
सवाल : भाजपा कौन सी स्थापना दिवस मना रही है?
अशोक : 32वां।
सवाल : भाजपा की स्थापना कहां और कब हुई थी?
अशोक : अटल बिहारी वाजपेयी व एलके आडवाणी ने की।
सवाल : पार्टी के मुखपत्र का नाम क्या है?
अशोक : पता नहीं।
सवाल : पार्टी के दो राष्ट्रीय महासचिवों के नाम?
अशोक : धर्मेन्द्र प्रधान व अनंत कुमार
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शांति देवी(जिलाध्यक्ष, महिला मोर्चा)
शांति-काफी दिनों से पार्टी की सेवा कर रहा हूं।
सवाल : भाजपा कौन सी स्थापना दिवस मना रही है?
शांति : जवाब ढूंढते हुए, फिर एक कार्यकर्ता से कहती हैं ऐ बताओ।
सवाल : भाजपा की स्थापना कब और कहां हुई थी? संस्थापक कौन थे?
शांति : बैनर पर देखते हुए। आडवाणी जी...
सवाल : पार्टी के मुखपत्र का नाम क्या है?
शांति : मुखपत्र..... पता नहीं।
सवाल : पार्टी के दो राष्ट्रीय महासचिवों के नाम?
शांति : महासचिव ......पता नहीं
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विकास सिंह, भाजपा नेता
विकास-पार्टी में पूरी निष्ठा के साथ काम करता हूं।
सवाल : भाजपा कौन सी स्थापना दिवस मना रही है?
विकास : जवाब ढूंढते हुए, कार्यकर्ता को बुलाकर कहते हैं, ऐ बताओ।
सवाल : भाजपा की स्थापना कब और कहां हुई?
विकास : अटल-आडवाणी ने की।
सवाल : पार्टी के मुखपत्र का नाम क्या है?
जबाब : मुखपत्र..... पता नहीं।
सवाल : पार्टी के दो राष्ट्रीय महासचिवों के नाम?
जबाब : अनंत कुमार व धर्मेन्द्र प्रधान
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राजहंस तिवारी
राजहंस-पार्टी में पूरी निष्ठा के साथ काम कर रहा हूं।
सवाल : भाजपा कौन सी स्थापना दिवस मना रही है?
राजहंस : 32वां।
सवाल : भाजपा की स्थापना किसने की?
राजहंस : अटल-आडवाणी ने।
सवाल : पार्टी के मुखपत्र का नाम क्या है?
राजहंस : मुखपत्र..... पता नहीं।
सवाल : पार्टी के दो राष्ट्रीय महासचिवों के नाम?
जवाब : अनंत कुमार व धर्मेन्द्र प्रधान
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देवेंद्र सिंह(वरिष्ठ भाजपा नेता)
देवेन्द्र-पार्टी का निष्ठावान कार्यकर्ता हूं।
सवाल : भाजपा कौन सी स्थापना दिवस मना रही है?
जबाब : 32वां।
सवाल : भाजपा की स्थापना किसने की?
जबाब : श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने।
सवाल : पार्टी के मुखपत्र का नाम क्या है?
जबाब : कमल संदेश
सवाल : पार्टी के दो राष्ट्रीय महासचिवों के नाम?
जबाब : अनंत कुमार व धर्मेन्द्र प्रधान
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राजकुमार श्रीवास्तव(अध्यक्ष, महानगर भाजपा)
राजकुमार-मैं पार्टी का एक कमर्ठ कार्यकर्ता हूं।
सवाल : भाजपा कौन सी स्थापना दिवस मना रही है?
जबाब : 32वां।
सवाल : भाजपा की स्थापना कब हुई?
जबाब : जनसंघ 1980 में भाजपा के रूप में तब्दील हो गया।
सवाल : पार्टी के मुखपत्र का नाम क्या है?
जबाब : कमल संदेश
सवाल : पार्टी के दो राष्ट्रीय महासचिवों के नाम?
जबाब : अनंत कुमार व धर्मेन्द्र प्रधान
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भाजपा का इतिहास
भाजपा का पुराना नाम भारतीय जनसंघ है। जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 1951 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिल्ली में की थी। 1953 में मुखर्जी के कश्मीर के जेल में निधन के बाद जनसंघ की जिम्मेदारी पं. दीनदयाल उपाध्याय के कंधे पर आ गई थी। इस दौरान पार्टी का चुनाव चिन्ह लैंप था। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1975-76 में आपातकाल लागू कर दिया गया तो जनसंघ में देश के प्रमुख राजनैतिक दलों का विलय हो गया और एक नये संगठन जनता पार्टी का गठन हुआ। फिर जनता पार्टी 1980 में टूट गई। जनसंघ विचारधारा के नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गठन किया। भाजपा 1998 से 2004 तक राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन(एनडीए)सरकार की सबसे बड़ी पार्टी रही।
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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष: नीतिन गडकरी
संसदीय दल अध्यक्ष: लालकृष्ण आडवाणी
नेता लोकसभा: सुषमा स्वराज(विपक्ष)
नेता राज्यसभा: अरूण जेटली(विपक्ष)
महासचिव: अनंत कुमार, थवारचंद गहलोत, अनंत कुमार, धर्मेन्द्र प्रधान, जेपी नड्डा, विजय गोयल, तापिर गाव व नरेन्द्र सिंह तोमर
संगठन महामंत्री: रामलाल
गुरुवार, 5 अप्रैल 2012
गाउन पहन लहराया टैलेंट का परचम
शाम पांच बजते ही एक्सएलआरआइ ऑडिटोरियम छात्रों व अभिभावकों से भर चुका था। जूनियर छात्र अपने सीनियर (पास आउट) को बधाई दे रहे थे। दीक्षांत समारोह कुछ ही देर में शुरू होने वाला था लेकिन कई छात्रों के माता-पिता की फ्लाइट अभी लैंड नहीं हुई थी। शाम सात बजे दीक्षांत समारोह शुरू हुआ तो भविष्य के भावी मैनेजर गाउन पहने सामने आए। लगा नई दुनिया की इस सरजमीं पर भारी संख्या में खेवनहार आएं हो। तालियों से कई मिनट तक टाटा सभागार गूंजता रहा। शिखर पर पहुंच चुके स्टैंडर्ड चार्टर्ड के सीईओ जसपाल सिंह बिंद्रा व इंफोसिस के मुख्य परामर्शदाता (चीफ मेंटर) एनआर नारायण मूर्ति को अपने बीच पाकर छात्र फूले नहीं समा रहे थे। भावी मैनेजर इन महारथियों की हर गतिविधि से प्रेरणा ले रहे थे।
इस दौरान 257 छात्रों को मेडल दिये गये। इनमें कुछ को विभिन्न अवार्ड से सम्मानित किया गया।
यहां यह बता दें कि इस साल बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की कंपनी मैकिंजे एंड कंपनी के अलावा डेलॉइट ने सबसे अधिकतम वेतनमान चालीस लाख पर एक्सएलआरआइ के 12 छात्रों को अनुबंधित किया है। इस साल न्यूनताम वेतनमान 15.50 लाख के सालाना पैकेज पर छात्रों को विभिन्न मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिली है। अवार्ड पाने के बाद सभी भावी प्रबंधकों ने अपने टोपियों को हवा में उछाल दिया।
नए आइडिया पर काम करें, जवान बने रहें : बिंद्रा
जमशेदपुर, नगर संवाददाता : हर दिन किसी न किसी नई सोच के साथ मैदान में आना होगा। आज हर दिन कुछ अलग करने की कोशिश होनी चाहिए, तभी लोग देखेंगे। तभी लोग खरीदेंगे। यह बातें जमशेदपुर स्थित एक्सएलआरआइ के 56वें दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एशिया (सीईओ) जसपाल सिंह बिंद्रा ने कहीं। उन्होंने कहा कि स्कूलिंग खत्म हो जाती है, लेकिन सीखना हमेशा जारी रहता है।
एक्सएलआरआइ के भावी प्रबंधकों को बिंद्रा ने सलाह दी कि मेहनत के साथ-साथ समय का इंतजार करना चाहिए। आप अचानक किसी दिन जंप कर जाएंगे। हांगकांग, सिंगापुर, भारत सहित एशिया के 19 देशों में बतौर स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जिम्मेदारियां निभा रहे बिंद्रा ने कहा कि सफल होने के लिए दो चीजें जरूरी हैं। पहला बेहतर फैसले लेना व दूसरा अनुभव लेना और देना। अपने अनुभव बांटते हुए बिंद्रा ने बताया- काफी पहले मैं अमेरिका में काम करता था। एक दिन मुझे सान फ्रांसिस्को में एक प्रोजेक्ट तैयार करने को कहा गया। मैं काफी परेशान था यह सोच कर कि कैसे कर पाऊंगा। फिर बाद में मुझे याद आया कि मैं जसपाल सिंह बिंद्रा हूं। सबकुछ कर सकता हूं। उन्होंने कहा कि आज के समय में आप किसी को नजरअंदाज नहीं कर सकते। हम अपने परिवार को और काम को नजरअंदाज कर सकते हैं, लेकिन प्रतिभा को कभी नहीं।




