सोमवार, 20 जनवरी 2025

हमेशा आप ही सही हों, जरूरी नहीं


सही या गलत का सवाल टेढ़ा है। ज्यादातर हम दूसरों को ही गलत ठहराते हैं। गलत होना क्योंकि गलत बात होती है, इसलिए हमें खुद को गलत मानने में दिक्कत होती है। पर खुद को ही सही मानते समय दो बातें रह जाती हैं। एक, दूसरा भी सही हो सकता है। दो, सामने वाले के सही होने से आप गलत नहीं हो जाते, यानी दोनों भी सही हो सकते हैं। 

अपनी जिद को यूं करें कम 
’  दूसरे पहलू पर भी विचार करें। 
’  मैं ही सही की बजाय, दूसरा भी सही की दिशा में सोचें। 
’  खुद का बचाव करने की बजाय नया सीखने पर जोर दें।
’  बोलने की बजाय दूसरों को सुनने पर भी ध्यान दें।
’  मानवीय और उदार बने रहें। 
’  बड़े उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए फैसले लें। इस बात पर सहमत हो जाएं कि आप असहमत हैं। 
’  अहं को आड़े न लाएं। काम पर ध्यान दें।
’  खुद को सकारात्मक रूप से बदलने के लिए तैयार रहें


‘तुमसे बात करना बेकार है। अपने सिवा कोई सही ही नहीं दिखता।’ एक ने दूसरे को यह कहा और उठकर चला गया। जिन लोगों को लगता है कि वे ही हमेशा सही होते हैं, उनके साथ अकसर ऐसा ही होता है। बातचीत अधूरी रह जाती है और तनातनी होने लगती है।
कुछ जाना-पहचाना लगा? आपके साथ भी ऐसा ही होता है? आप अकेले नहीं हैं, ज्यादातर का मन यही कहता है कि वही ठीक हैं। अपने गलत होने के बारे में सोचते ही हमें कष्ट होने लगता है। बेचैनी, अपमान और हीनता जैसे भाव सताने लगते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि घर, स्कूल और ऑफिस हर जगह केवल सही होना ही सिखाया जाता है। खुद को सही होते हुए देखने में ही हमें अपनी अहमियत महसूस होती है।  ‘बीइंग रॉन्ग’ की लेखिका कैथरीन शल्ज कहती हैं, ‘हम गलत भी हो सकते हैं, यह मान न पाना हमारी समझ को कुंद कर देता है।’ जब हम गलत होने से डरते हैं तब अपनी गलतियों से सीख भी नहीं पाते। दूसरों को सुनना बंद कर देते हैं और सुनाने ज्यादा लगते हैं। नई चीजें जानने से रह जाते हैं।
हम ही क्यों सही हैं? 
इस सवाल के हमारे मन के पास कई जवाब होते हैं। हमें लगता है कि हमें ही बात की पूरी जानकारी और अनुभव है। दूसरा ज्यादा ही होशियारी दिखा रहा है या फिर हमारे लिए सामने वाले की मंशा ही खराब है। हो सकता है कि कुछ मामलों में ऐसा होता हो, पर हमेशा ऐसा नहीं होता। छोटी-बड़ी हर बात में हम ही सही हैं, यह आग्रह हमें दूसरों की बात को समझने से ही रोक देता है। हमारी बातचीत और व्यवहार को रूखा बना देता है। ऐसे में जब कोई कहता है कि हम गलत हंै, तब हम गुस्से में भर उठते हैं। चिल्लाने लगते हैं। छोटी सी बात का बतंगड़ बनाकर केवल सही-गलत साबित करने में जुट जाते हैं। अपना ही नहीं दूसरों का भी बड़ा नुकसान कर बैठते हैं। 
   मैनेजमेंट विषयों के जानकार और लेखक हैं मार्क मेनसन। वह कहते हैं,‘जानकारी न होना गलत नहीं होता। गलती मान लेना हमें गलत सूचनाओं से बचाता है। इससे लगातार सीखने और आगे बढ़ने का सिलसिला बना रहता है।’ 
सही-गलत ही काफी नहीं 
हमेशा सही होने का भाव विचारों का ऐसा जंजाल है, जहां हर चीज फायदे-नुकसान के पलड़ों पर तौली जाती है। कितनी ही बार जो बात एक समय में हमें सही लगती है, बाद  में कुछ और ही नजर आती है। ऐसे में अपनी बात पर अड़े रहना भावी बातचीत के पुलों को भी तोड़ देता है। 
      फिर हम मानें या नहीं, पर हमेशा सही होने की जिद, हमें दूसरों के लिए असंवेदनशील बना देती है। यही वजह है कि ्प्रिरचुअल व मोटिवेशनल लेखक एकहार्ट टोल कहते हैं, ‘हमेशा सही होने की जिद एक तरह की हिंसा है। हम खुद को दूसरों पर थोपते हैं। अड़े रहते हैं। दूसरों को जगह नहीं देते।’ 
 हमेशा सही और गलत की भाषा में ही बात करके कुछ हासिल भी  नहीं होता। यह बेहद थकाऊ और फिजूल काम है। हर किसी के अपने  दुख हैं, अपने सरोकार हैं। अपने-अपने सच हैं। फिर, दूसरे का सही होना, आपको गलत नहीं बना देता। हमारे लिए क्या जरूरी है, यह हमें तय करना है। अपने आगे बढ़ने की यात्रा अपने बूते तय करनी होती है। ऐसे फैसले लेने होते है कि काम भी न रुके और आगे भी बढ़ते रहें। 
 अंत में सही या गलत होने की बजाय हमारा उदार व मानवीय होना असल बात है। हमेशा सही बोलने वाले दिमाग में तब्दील होने की बजाय दूसरों को सुनने और समझने वाला दिल होना ज्यादा अच्छा है। है ना!       

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