मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

Papa Vs masals

सोमवार, 20 जनवरी 2025

हमेशा आप ही सही हों, जरूरी नहीं


सही या गलत का सवाल टेढ़ा है। ज्यादातर हम दूसरों को ही गलत ठहराते हैं। गलत होना क्योंकि गलत बात होती है, इसलिए हमें खुद को गलत मानने में दिक्कत होती है। पर खुद को ही सही मानते समय दो बातें रह जाती हैं। एक, दूसरा भी सही हो सकता है। दो, सामने वाले के सही होने से आप गलत नहीं हो जाते, यानी दोनों भी सही हो सकते हैं। 

अपनी जिद को यूं करें कम 
’  दूसरे पहलू पर भी विचार करें। 
’  मैं ही सही की बजाय, दूसरा भी सही की दिशा में सोचें। 
’  खुद का बचाव करने की बजाय नया सीखने पर जोर दें।
’  बोलने की बजाय दूसरों को सुनने पर भी ध्यान दें।
’  मानवीय और उदार बने रहें। 
’  बड़े उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए फैसले लें। इस बात पर सहमत हो जाएं कि आप असहमत हैं। 
’  अहं को आड़े न लाएं। काम पर ध्यान दें।
’  खुद को सकारात्मक रूप से बदलने के लिए तैयार रहें


‘तुमसे बात करना बेकार है। अपने सिवा कोई सही ही नहीं दिखता।’ एक ने दूसरे को यह कहा और उठकर चला गया। जिन लोगों को लगता है कि वे ही हमेशा सही होते हैं, उनके साथ अकसर ऐसा ही होता है। बातचीत अधूरी रह जाती है और तनातनी होने लगती है।
कुछ जाना-पहचाना लगा? आपके साथ भी ऐसा ही होता है? आप अकेले नहीं हैं, ज्यादातर का मन यही कहता है कि वही ठीक हैं। अपने गलत होने के बारे में सोचते ही हमें कष्ट होने लगता है। बेचैनी, अपमान और हीनता जैसे भाव सताने लगते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि घर, स्कूल और ऑफिस हर जगह केवल सही होना ही सिखाया जाता है। खुद को सही होते हुए देखने में ही हमें अपनी अहमियत महसूस होती है।  ‘बीइंग रॉन्ग’ की लेखिका कैथरीन शल्ज कहती हैं, ‘हम गलत भी हो सकते हैं, यह मान न पाना हमारी समझ को कुंद कर देता है।’ जब हम गलत होने से डरते हैं तब अपनी गलतियों से सीख भी नहीं पाते। दूसरों को सुनना बंद कर देते हैं और सुनाने ज्यादा लगते हैं। नई चीजें जानने से रह जाते हैं।
हम ही क्यों सही हैं? 
इस सवाल के हमारे मन के पास कई जवाब होते हैं। हमें लगता है कि हमें ही बात की पूरी जानकारी और अनुभव है। दूसरा ज्यादा ही होशियारी दिखा रहा है या फिर हमारे लिए सामने वाले की मंशा ही खराब है। हो सकता है कि कुछ मामलों में ऐसा होता हो, पर हमेशा ऐसा नहीं होता। छोटी-बड़ी हर बात में हम ही सही हैं, यह आग्रह हमें दूसरों की बात को समझने से ही रोक देता है। हमारी बातचीत और व्यवहार को रूखा बना देता है। ऐसे में जब कोई कहता है कि हम गलत हंै, तब हम गुस्से में भर उठते हैं। चिल्लाने लगते हैं। छोटी सी बात का बतंगड़ बनाकर केवल सही-गलत साबित करने में जुट जाते हैं। अपना ही नहीं दूसरों का भी बड़ा नुकसान कर बैठते हैं। 
   मैनेजमेंट विषयों के जानकार और लेखक हैं मार्क मेनसन। वह कहते हैं,‘जानकारी न होना गलत नहीं होता। गलती मान लेना हमें गलत सूचनाओं से बचाता है। इससे लगातार सीखने और आगे बढ़ने का सिलसिला बना रहता है।’ 
सही-गलत ही काफी नहीं 
हमेशा सही होने का भाव विचारों का ऐसा जंजाल है, जहां हर चीज फायदे-नुकसान के पलड़ों पर तौली जाती है। कितनी ही बार जो बात एक समय में हमें सही लगती है, बाद  में कुछ और ही नजर आती है। ऐसे में अपनी बात पर अड़े रहना भावी बातचीत के पुलों को भी तोड़ देता है। 
      फिर हम मानें या नहीं, पर हमेशा सही होने की जिद, हमें दूसरों के लिए असंवेदनशील बना देती है। यही वजह है कि ्प्रिरचुअल व मोटिवेशनल लेखक एकहार्ट टोल कहते हैं, ‘हमेशा सही होने की जिद एक तरह की हिंसा है। हम खुद को दूसरों पर थोपते हैं। अड़े रहते हैं। दूसरों को जगह नहीं देते।’ 
 हमेशा सही और गलत की भाषा में ही बात करके कुछ हासिल भी  नहीं होता। यह बेहद थकाऊ और फिजूल काम है। हर किसी के अपने  दुख हैं, अपने सरोकार हैं। अपने-अपने सच हैं। फिर, दूसरे का सही होना, आपको गलत नहीं बना देता। हमारे लिए क्या जरूरी है, यह हमें तय करना है। अपने आगे बढ़ने की यात्रा अपने बूते तय करनी होती है। ऐसे फैसले लेने होते है कि काम भी न रुके और आगे भी बढ़ते रहें। 
 अंत में सही या गलत होने की बजाय हमारा उदार व मानवीय होना असल बात है। हमेशा सही बोलने वाले दिमाग में तब्दील होने की बजाय दूसरों को सुनने और समझने वाला दिल होना ज्यादा अच्छा है। है ना!       

बेटे ने मां से पूछा, ‘मां वो कौन है?

 एक मां अपने बेटे के साथ बाजार जा रही थी। उसी समय उस बाजार से कुछ सिपाही एक चोर को लेकर जा रहे थे। 

बेटे ने मां से पूछा, ‘मां वो कौन है? उसके आस-पास सिपाही क्यों हैं?’

     मां ने कहा,‘वो एक चोर है। सिपाही उसे पकड़ कर ले जा रहे हैं, ताकि उसे जेल में बंद करें।’

    थोड़ा आगे जाने पर नगर का राजा सामने आता नजर आया। उसके आस-पास भी बहुत सिपाही थे। बेटे ने तुरंत मां से कहा,‘मां, देखो सिपाही और एक चोर को ला रहे हैं।’ 

       मां ने हलकी आवाज में कहा,‘धीमे बोलो बेटा, वह राजा है। ऐसी बात करने पर हमें दंड दे सकते हैं।’

    बेटे ने कहा, ‘मां क्या फर्क है? राजा के आस-पास भी सिपाही हैं और चोर के आस-पास भी।’ 

    मां ने कहा,‘जमीन-आसमान का फर्क है। उस चोर के आस-पास जो सिपाही हैं, वे चोर को काबू में रखते हैं, अगर वह भागने की कोशिश करे तो उसे और भी सख्त सजा मिल सकती है। सिपाही चोर को जो खाने को दें, उसे खाना होगा। जहां रहने को ले जाएं, वहां रहना होगा। इसके विपरीत, वे सारे सिपाही राजा के काबू में हैं। राजा जो बोले, वह उन्हें करना होगा। अगर राजा कहे मुझे अकेला छोड़ दो तो सिपाहियों को राजा का कहना मानना होगा।’

    ऐसे ही हमारा मन, हमारी भावनाएं, हमारे विचार या हमारी इंद्रियां सिपाही हैं। अगर हम उनके काबू में हैं तो हम चोर हो गए और हमें अपने मन, विचार और इंद्रियों के वश में होकर जीवन जीना पड़ेगा। और अगर वे हमारे काबू में हों तो हम राजा की तरह जीवन जी पाएंगे।

आहत लोगों का एक-दूसरे के प्रति आकर्षण

 

ऐसे लोग जिन्हें आप नहीं जानते या फिर वे वास्तव में मौजूद नहीं होते, उनके साथ एकतरफा भावनात्मक रिश्ता होना  पैरासोशल संबंध कहलाता है। किसी गायक, खिलाड़ी, अभिनेता, किसी किताब या शो के काल्पनिक पात्र से जुड़कर उनके फैन होना यही है। कई बार समर्पण इतना होता है कि व्यक्ति उनकी हर छोटी बात पर नजर रखता है, उनसे प्रभावित रहता है, उनकी जीत-हार को खुद के साथ जोड़ लेता है। 

  हार्वर्ड कैनेडी स्कूल में प्रोफेसर, समाजशास्त्री और लेखक अर्थर सी. ब्रूक्स के अनुसार, ‘ये रिश्ते दूसरों से जुड़ने की हमारी सहज प्रवृत्ति से ही बनते हैं। आज अपने पसंदीदा सेलिब्रिटीज और काल्पनिक किरदारों से जुड़ी सूचनाओं तक पहुंच बनाने के कई साधन मौजूद हैं। हैरी पॉटर बुक सीरीज और बे्रकिंग बैड जैसे टीवी शो की लोकप्रियता का बड़ा कारण यह भी है।  आप इन चरित्रों से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं, फिर भले वह पात्र मनोरोगी भी हो। पर, बु्रक्स कहते हैं कि हर रिश्ते की तरह इन संबंधों के फायदे और नुकसान दोनों हैं। 

   विशेषज्ञों के अनुसार, माता-पिता को बच्चों के पैरासोशल संबंधों पर नजर रखनी चाहिए। अगर  आप खुशी के लिए किसी एक किरदार पर बहुत अधिक निर्भर हैं तो देखें कि असल कमी कहां है? बेहतर यह है कि आप असल जीवन में मधुर संबंध बनाएं। किसी मित्र के साथ भोजन करें। परिवार संग समय बिताएं। लोगों को स्पर्श करें, गले लगाएं। जब असली रिश्ते अच्छे बनेंगे तो काल्पनिक किरदारों की कम परवाह करेंगे। 

                                           (हार्वर्ड हेल्थ ब्लॉग से साभार)


लाभ

ये रिश्ते जीवन के लिए अच्छे पूरक हो सकते हैं। आपको प्रेरित, शिक्षित और सुकून दे सकते हैं। एक समूह या विचार से जुड़े होने के कारण व्यक्ति अकेलापन कम महसूस करता है। किसी किरदार से बहुत जुड़ाव मूल्यों पर भी असर डाल सकता है। हम उनसे सही-गलत के सबक, अनुशासन व  आदि सीखने के लिए प्रेरित होते हैं।  

नुकसान

बू्रक्स कहते हैं, ‘ऐसे रिश्तों में प्यार के बदले में प्यार नहीं मिलता। ये नकली भोजन की तरह है, जो देखने में सुंदर हैं पर पोषण नहीं मिलता। ऐसे में अगर आप बहुत निर्भर हैं, तो अकेलापन और अलगाव बढ़ सकता है। हम पात्र से गलत सबक सीख सकते हैं।  

आहत लोगों का एक-दूसरे के प्रति आकर्षण

 अपने अकेलेपन को दें सही दिशा 

यं को बेहतर बनाते हुए आगे बढ़ना एक अलग सा अनुभव होता है। कभी-कभी यह एक खूबसूरत अहसास लगता है तो कभी बहुत अजीब सा महसूस होने लगता है। असल में जब आप सालों तक भावनात्मक आघात झेलने और बचपन के कड़वे अनुभवों को संज्ञान में लेकर उनसे बाहर निकलने की दिशा में काम करने लगते हैं तो आपका एक नया व्यक्तित्व उभर कर सामने आने लगता है। अचानक ही आप स्वयं को एक ऐसी दुनिया में पाते हैं, जहां आप अकेले हैं। किसी स्थिति में फंसे रहने और उससे बाहर निकलने के बीच का यह फासला एक ऐसी खाई की तरह महसूस होता है, जिसे पाटा नहीं जा सकता है।

बस पड़ाव है अकेलापन 

स्वयं के विकास और आगे बढ़ने की यात्रा हममें बहुत कुछ बदलाव लाती है। हम दुनिया को और खुद को अलग ढंग से देखने लगते हैं। हीलिंग की प्रक्रिया में कई बार हमें अपने एकाकीपन को भी गले लगाना पड़ता है। आपकी प्राथमिकताएं और रिश्तों को लेकर समझ तो बदलती ही है साथ ही ऊपरी दिखावे वाले रिश्ते भी खोखले लगने लगते हैं। 

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन द्वारा 2023 में किए गए एक शोध के अनुसार, 48 प्रतिशत अमेरिकी अकेलेपन का शिकार हैं और 60 प्रतिशत लोगों को लगता है कि कोई उन्हें समझता ही नहीं है। अकेलापन असहज करता है, क्योंकि हम अपनी कमजोरियों का सामना करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए, बहुत से लोग ऐसे परिवेश में पले-बढ़े होते हैं, जहां भावुक होने को कमजोरी की निशानी माना जाता है। इसलिए उन्हें अपनी पीड़ा व्यक्त करने की बजाय उसे छिपाने की शिक्षा दी जाती है। लेकिन, जब आप ऐसे माहौल से खुद को बाहर निकालने के प्रयास करने लगते हैं तो आप आपसी समझ, सम्मान, ईमानदारी और पारदर्शी रिश्तों के प्रति आकर्षित होने लगते हैं। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या कम ही होती है। 

पुरानी रूढ़ियों से आगे निकलना

स्वयं का विकास उन संबंधों से आगे निकलना भी है, जो कभी आपको सुकून पहुंचाते थे। कहते हैं कि हम अपनी सोच जैसे लोगों के प्रति ही आकर्षित होते हैं। अर्थात, जब दो लोग मिलते हैं तो उनके छिपे हुए दर्द भी अकसर आपस में जुड़ जाते हैं। विख्यात मनोविशेषज्ञ हार्वेल हेंड्रिक्स ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि हम ऐसे साथी का चुनाव करते हैं, जो हमारे अतीत के घावों को परिलक्षित करता है। लेकिन जब आप बेहतर महसूस करने लगते हैं तो स्वत: ही ऐसे लोगों से दूरी बना लेते हैं। यदि आप अपने अतीत के कटु अनुभवों या यादों के साथ सेहतमंद तरीके से निबटना सीख जाते हैं तो वो लोग अपने आप ही दूर होने लगते हैं, जो ऐसा करना नहीं जानते हैं। आपकी भावनात्मक स्पष्टता उन्हें अपनी पहुंच से बाहर लगने लगती है, जबकि वे उसी पुराने चक्र में उलझे रहते हैं।

ऐसे बनेंगे सेहतमंद रिश्ते

ऐसे समाज में जहां हर व्यक्ति संघर्ष कर रहा हो, अच्छे और बेहतर रिश्ते बनाना अपने आप में बहुत थका देने वाला अनुभव हो सकता है। लेकिन, यह असंभव कार्य नहीं है। कुछ बातों का ध्यान रखकर ऐसा किया जा सकता है।

समान सोच के लोगों से जुड़ें 

ऐसे समुदायों का हिस्सा बनें, जहां विकास, चेतना और सकारात्मक तरीकों से आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता हो। आप चाहें तो किसी ऑनलाइन सपोर्ट ग्रुप या ध्यान शिविर में भी हिस्सा ले सकते हैं। इन स्थानों पर आपको अपनी मानसिक सेहत बेहतर बनाने में बहुत मदद मिल सकती है।

सीमाओं का निर्धारण

जो लोग आपकी भावनात्मक ऊर्जा बेकार में खर्च करवाते हों, उनसे दूरी बना लेने में कोई बुराई नहीं है। सीमाओं का अर्थ दीवार नहीं है, बल्कि अपनी मानसिक शांति की रक्षा करना भी है। सीमाएं निर्धारित कर लेने पर आपको भावनात्मक रूप से परिपक्व लोगों के साथ समय बिताने का अधिक समय मिलेगा। आप खुद को  बेहतर और ऊर्जावान महसूस करेंगे। 

सच्चे रिश्तों को महत्व दें 

जो लोग आपसे प्रेम करते हैं और आपको आगे बढ़ते देखकर खुश होते हैं, उन्हें सहेज कर रखें। हो सकता है ऐसा करने से आपके पास बहुत कम रिश्ते बचें। पर, ये वो कीमती रिश्तें हैं, जो आपको नई राह दिखाएंगे। 

जारी रखें अपनी यात्रा

हो सकता है कि और ज्यादा बेहतर की चाह आपको अपने भीतर बदलाव करने के लिए उकसाती हो। पर, उस कारण को याद रखिए, जिसकी वजह से आप यहां तक बढ़ कर आए हैं। अपनी यात्रा में साथ देने वाले लोगों पर भी भरोसा रखिए कि वे  आपको सही मार्ग चुनने में मदद करेंगे। खुद पर यकीन और अपनों का साथ यात्रा के आनंद को बढ़ा देता है।  


आहत लोगों का एक-दूसरे के प्रति आकर्षण

यह मानव स्वभाव है और शोध भी मानते हैं कि भावनात्मक रूप से आहत लोग एक-दूसरे के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं। पर्सनैलिटी एंड सोशल साइकोलॉजी द्वारा किए गए एक शोध में भी पाया गया कि एक जैसी भावनात्मक समस्याओं से जूझ रहे लोग आपस में ज्यादा जुड़ते हैं। लेकिन, जब आप इस चक्र को तोड़ने की दिशा में काम करते हैं तो आपके रिश्तों का रूप बदल जाता है। जो शुरुआत में कुछ खोने या अकेले पड़ जाने का अहसास देता है। कई बार ऐसे लोग आप पर उनसे जुड़े रहने के लिए दबाव डालते हैं, आपको खुदगर्ज मान लेते हैं। ऐसे क्षणों में खुद पर भरोसा रखना आपकी अपनी मानसिक सेहत को अच्छा रखने में मदद कर सकता है। 


आगे बढ़ने से मिलेगी शांति

आगे बढ़ने के साथ-साथ आपको समझ आने लगता है कि आप अकेले नहीं हैं। दुनिया में अनेक  ऐसे लोग हैं, जो आगे बढ़ते हुए आपकी तरह ही अकेला महसूस करते हैं। लेकिन स्वयं की बेहतरी लोगों की भीड़ में नहीं, बल्कि अंतर्मन को जाग्रत करने में ही निहित है। इसलिए हतोत्साहित करने वाले लोगों की तरफ ध्यान न देकर सिर्फ मंजिल की ओर कदम बढ़ाएं। अपने से जुड़ते हुए आगे बढ़ना ही असल शांति की ओर ले जाता है।